मेरे बाद तुम्हारी अगली प्रेमिकाओं को नहीं सहेजनी पड़ेंगी तुम्हारी कतरन, जिसे जोड़कर मैंने तुम्हारा आज बनाया । उन्हें नहीं मालूम चलेगा कि तुम्हारा बिखरना कितना सुंदर था । नहीं महसूस कर पाएंगी वो कि आंचल में तुम्हारा कतरा बटोरकर इश्क़ की पतंग बनाना कैसा होता है । वो नहीं देख पाएंगी कि जिन सपनों को तुम जी रहे हो उसकी शुरुआती नींद कितने सुकून की थी । उन्हें नहीं मिलेगा सूखी रोटी, छोटी कटोरी और पहाड़ी चकोरी का साथ। मेरे बाद तुम्हारी अगली प्रेमिकाएं नहीं छू पाएंगी वो जगहें जहां मैंने बीज बोए हैं । क्योंकि तुम्हारी अगली प्रेमिकाएं देखेंगी पेड़ और झूलेंगी झूला हर सावन में । - © प्रियंका
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अपाहिज सोच
उसे बहुत देर बाद उस भरी बस में सीट मिली थी.... एक लड़की उस सीट में बैठने ही जा रही थी की उसने वो सीट झट से लपक ली. वो लड़की टेढ़ी नज़रों से ज़ेबा को देख रही थी.. और ज़ेबा तिरछी नज़रों से अपने बगल में बैठे एक आदमी को. उसने खड़ी लड़की को LADIES सीट से उस आदमी को उठाने के लिए इशारा किया पर बदले में ज़ेबा को उस लड़की का बना हुआ सा एक मुह मिला...."IDIOTS....क्या इन्हें पता नहीं है की ये LADIES सीट है पर फिर भी आकर बैठ जायेंगे.... ताकि लड़कियां इन्हें सीट से उठाने के बहाने ही बात कर सके, क्यूंकि ऐसे तो कोई लड़की इन्हें घास डालेगी नहीं." अचानक वो आदमी उठने को हुआ और ज़ेबा के पैर पर कुछ चुभा उसने गुस्से से नज़र फिराई तो देखा की उस आदमी की बैसाखी गलती से ज़ेबा के पैर पर लग गयी थी. और ज़ेबा की सोच अपाहिज सी हो गयी.
संतुलन photo credits : tauseef iqbal बात बचपन की है जब मेरे कमरे की दीवार पर लगे स्विच को मैं टुकुर टुकुर देखती थी। नन्हे हाथ कभी उसे ऑफ तो कभी उसे ऑन करते । एक दिन मैंने उसे ऑफ और ऑन के बीच रोकने की कोशिश की। एक लम्बी कोशिश.... जिसने बचपन को जवानी ....और जवानी को बुढ़ापे में तब्दील कर दिया। आज भी मैं ऑफ ऑन के बीच उसे रोकने की कोशिश में हूँ। लेकिन इस लम्बी कोशिश में पता नहीं कब स्विच … ज़िन्दगी में बदल गया है ।

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